चाचा – भतीजे की चाल या राजनितिक परिपक्वता? राकांपा के दोनों गुट हुए एकमत 

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चाचा – भतीजे की चाल या राजनितिक परिपक्वता? राकांपा के दोनों गुट हुए एकमत 

लोकसभा का लिटमस टेस्ट माने जाने वाले पांच राज्यों का विधानसभा चुनाव नहीं लड़ेगा राकांपा का दोनों खेमा 

योगेश पाण्डेय – संवाददाता 

मुंबई – अगले महीने होने वाले पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों को 2024 के लोकसभा चुनाव के सेमीफइनल के तौर पर देखा जा रहा है। इसके लिए भाजपा नेतृत्व वाले एनडीए और विपक्षी एकता के ‘इंडिया’ गठबंधनों ने कमरकस तैयारी शुरू कर दी है। राकांपा के विभाजन के बाद अजित पवार का गुट भाजपा प्रणीत एनडीए के साथ है, जबकि शरद पवार का गुट इंडिया अघाड़ी के साथ है। लेकिन इन दोनों ही गुटों ने आगामी पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव नहीं लड़ने का फैसला किया है। जहां कई अन्य मुद्दों पर दोनों गुटों में मतभेद हैं, वहीं एक तस्वीर यह भी है कि राकांपा के दोनों गुट बिना किसी फैसले के इस मुद्दे पर सहमत हो गए हैं।

जबकि इस बात पर विवाद चल रहा है कि वास्तव में असली राकांपा किसकी है और आधिकारिक चुनाव चिह्न पर किसका अधिकार है, राकांपा के दोनों गुटों ने पांच राज्यों में विधानसभा चुनावों में उम्मीदवार नहीं उतारने का फैसला किया है, जिसे लोकसभा का लिटमस टेस्ट माना जा रहा है। नवंबर महीने में पांच राज्यों मध्य प्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़, तेलंगाना और मिजोरम में चुनाव होने जा रहे हैं। मध्य प्रदेश में भाजपा सत्ता में है जबकि राजस्थान और छत्तीसगढ़ की सट्टा कांग्रेस के हाथ में है। इन पांचों राज्यों में राकांपा के पास ज्यादा ताकत नहीं है।

यदि राकांपा के दोनों गुटों ने लोकसभा चुनाव से पहले अपनी ताकत का परीक्षण करने के लिए संबंधित विधानसभा चुनाव लड़ने का फैसला किया होता, तो कानूनी पेंच पैदा हो सकता था और शायद ऐसे में राकांपा के आधिकारिक चुनाव चिन्ह घड़ी को फ्रीज करने की नौबत आ सकती थी। ऐसा हाल ही में शिवसेना के दोनों गुटों के बीच तब देखने को मिला था, ज़ब विधानसभा का उपचुनाव होना था। इन्ही वजहों को ध्यान में रखते हुए लगता है कि दोनों गुटों ने चुनाव से दूर रहने का फैसला किया है।

राकांपा के चुनाव चिन्ह को लेकर अगली सुनवाई 9 नवंबर को होगी। एक ही समय में होने वाले चुनाव न लड़कर दोनों गुटों ने चुनाव चिन्ह के कानूनी पेंच से स्वत: ही बचाव कर लिया है। क्योंकि अगर एक भी उम्मीदवार चुनाव लड़ता तो चुनाव चिन्ह को लेकर बड़ी फजीहत हो सकती थी, लेकिन दोनों गुटों के फैसले ने इस दुविधा को टाल दिया है।

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