22 साल बाद अभिनेत्री आशा पारेख को दादा साहेब फाल्के अवार्ड

22 साल बाद अभिनेत्री आशा पारेख को दादा साहेब फाल्के अवार्ड

भारतीय सिनेमा में सराहनीय योगदान के लिए राष्ट्रपति के हाथों 30 सितम्बर को किया जायेगा सम्मानित। पिछली बार 2019 में रजनीकांत को मिला था सम्मान 

योगेश पाण्डेय – संवाददाता 

मुंबई – अपने जमाने की जानी-मानी अभिनेत्री आशा पारेख को इस साल इंडियन फिल्म इंडस्ट्री के सर्वोच्च दादा साहेब फाल्के अवॉर्ड से सम्मानित किये जाने की घोषणा की गई है। आशा पारेख को यह सम्मान फिल्म इंडस्ट्री में दिए गए सराहनीय योगदान के लिए दिया जाएगा। यह सम्मान देश की राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू के हाथों 30 सितम्बर को दिया जायेगा।

79 साल की आशा पारेख को ये सम्मान 68वें राष्ट्रीय फिल्म अवॉर्ड कार्यक्रम में प्रदान किया जाएगा। आखिरी बार यह अवॉर्ड 2019 में हुआ था, जिसमें साउथ सुपरस्टार रजनीकांत को दादा साहेब फाल्के अवॉर्ड से सम्मानित किया गया था।

22 साल में ये पहली बार हुआ है, जब किसी महिला को दादा साहेब फाल्के अवॉर्ड से सम्मानित किया गया हो। आखिरी बार साल 2000 में गायिका आशा भोसले को ये अवॉर्ड दिया गया था, जिसके बाद आशा पारेख ये जीतने वाली पहली महिला हैं। आशा पारेख से पहले आशा भोसले, लता मंगेशकर, दुर्गा खोटे, कानन देवी, रूबी मेयर्स, देविका रानी भी इस अवॉर्ड को हासिल कर चुकी हैं। बता दें कि साल 1969 में देविका रानी ये अवॉर्ड हासिल करने वाली पहली अभिनेत्री थीं।

आशा पारेख ने महज 10 साल की उम्र में अपने अभिनय करियर की शुरुआत की थी। 1952 में रिलीज हुई फिल्म ‘आसमान’ में उन्होंने पहली बार बतौर बाल कलाकार काम किया था। इसके बाद बिमल रॉय की फिल्म ‘बाप बेटी’ (1954) में उन्होंने काम किया, लेकिन इसकी असफलता ने उन्हें इस कदर निराश किया कि उन्होंने फिल्मों में काम न करने का फैसला ले लिया।

आशा पारेख ने 16 साल की उम्र में फिल्मों में वापसी का फैसला लिया। वे विजय भट्ट की फिल्म ‘गूंज उठी शहनाई’ (1959) में काम करना चाहती थीं, लेकिन डायरेक्टर ने उन्हें यह कहकर चांस नहीं दिया कि वे स्टार मटेरियल नहीं हैं। हालांकि, दूसरे ही दिन उन्हें प्रोड्यूसर सुबोध मुखर्जी और डायरेक्टर नासिर हुसैन ने अपनी फिल्म ‘दिल देके देखो’ (1959) में साइन कर लिया। इस फिल्म में शम्मी कपूर उनके अपोजिट रोल में थे। फिल्म सुपरहिट साबित हुई और आशा रातों रात बॉलीवुड की सुपरस्टार बन गईं। इस फिल्म के बाद नासिर हुसैन ने आशा को छः और फिल्मों ‘जब प्यार किसी से होता है’ (1961), ‘फिर वही दिल लाया हूं’ (1963), ‘तीसरी मंजिल’ (1966), ‘बहारों के सपने’ (1967), ‘प्यार का मौसम’ (1969) और ‘कारवां’ (1971) के लिए साइन कर लिया और सभी फिल्मों ने बॉक्स ऑफिस पर सफलता बटोरी।

आशा पारेख ने बॉलीवुड की करीब 95 फिल्मों में काम किया है। साल 1999 में आई फिल्म ‘सर आंखों पर’ वे आखिरी बार नजर आई थीं। आशा को 11 बार लाइफटाइम अचीवमेंट अवॉर्ड से सम्मानित किया जा चुका है। वहीं 1992 में उन्हें भारत सरकार की ओर से देश के प्रतिष्ठित सम्मान पद्मश्री से सम्मानित किया था।

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