51 साल बाद कांग्रेस ने फिर खेला दलित कार्ड, मल्लिकार्जुन खड़गे होंगे नये कांग्रेस अध्यक्ष ?

51 साल बाद कांग्रेस ने फिर खेला दलित कार्ड, मल्लिकार्जुन खड़गे होंगे नये कांग्रेस अध्यक्ष ?

बाबू जगजीवन राम के बाद दूसरे दलित अध्यक्ष बन सकते हैं खड़गे। मोदी लहर के बावजूद अपनी लोकसभा सीट बचाने के चलते पार्टी में मिली वरीयता

योगेश पाण्डेय – संवाददाता 

मुंबई – कांग्रेस अध्यक्ष चुनाव में नामांकन के आखिरी दिन गांधी परिवार के करीबी और भरोसेमंद मल्लिकार्जुन खड़गे ने वाइल्ड कार्ड एंट्री मारकर सभी को चौंका दिया है। गुरुवार देर रात तक सोनिया गांधी और प्रियंका गांधी के बीच नए अध्यक्ष को लेकर मीटिंग हुई, जिसके बाद शुक्रवार सुबह खड़गे को 10 जनपथ पर बुलाया गया।

गांधी परिवार के बैकडोर सपोर्ट की वजह से खड़गे का कांग्रेस अध्यक्ष बनना तय माना जा रहा है। सबकुछ सही रहा तो मजदूर आंदोलन से करियर की शुरुआत करने वाले खड़गे देश क़ी सबसे पुरानी पार्टी कांग्रेस की कमान संभाल सकते हैं। अगर ऐसा होता है तो खड़गे बाबू जगजीवन राम के बाद दूसरे दलित अध्यक्ष बनेंगे।जो वर्ष 1970-71 में कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष थे।

2014 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस पार्टी 44 सीटों पर ही सिमट कर रह गई। मोदी लहर में पार्टी के कई दिग्गज नेता चुनाव हार गए। ऐसे में कर्नाटक के गुलबर्ग से आने वाले खड़गे ने अपनी सीट बचा ली, जिसका उन्हें फायदा मिला। कांग्रेस ने लोकसभा में उन्हें पार्टी का नेता बनाया।

दक्षिण भारत से होने के बावजूद खड़गे सदन में हिंदी में ही अपनी बातें रखते रहे। राहुल गांधी के उठाए गए राफेल से लेकर नोटबंदी के मुद्दे को खड़गे ने लोकसभा में बखूबी उठाया, जिससे वे टीम राहुल में भी शामिल हो गए। हालांकि 2019 के चुनाव में उन्हें हार का सामना करना पड़ा, लेकिन जल्द ही राज्यसभा के जरिए खड़गे ने सदन में एंट्री कर ली। बाद में पार्टी ने गुलाम नबी आज़ाद को हटाकर खड़गे को राज्यसभा में नेता प्रतिपक्ष बनाया था।

2019 में महाराष्ट्र में जब धुर-विरोधी उद्धव के साथ सरकार बनाने की बात आई, तो पार्टी ने खड़गे को ही प्रभारी बनाकर वहां भेजा। खड़गे सोनिया के इस मिशन को वहां कामयाब करने में सफल रहे। इतना ही नहीं, जुलाई महीने में जब ईडी ने सोनिया गाँधी और राहुल गाँधी को हेराल्ड मामले में पूछताछ के लिए तलब किया था,उस वक्त संसद में विरोध का मोर्चा खड़गे ने ही संभाला था।

2013 में कर्नाटक विधानसभा चुनाव के बाद खड़गे मुख्यमंत्री की रेस में सबसे आगे थे, लेकिन उन्हें केंद्र की पॉलिटिक्स में ही रहने के लिए कहा गया और उनकी जगह के. सिद्धरमैया को मुख्यमंत्री बनाया गया। खड़गे उस वक्त मनमोहन कैबिनेट में श्रम विभाग के मंत्री थे, जिसके बाद उन्हें रेल मंत्रालय का जिम्मा दिया गया।

50 साल से ज्यादा समय से पॉलिटिक्स में सक्रिय मल्लिकार्जुन खड़गे को 1969 में कर्नाटक के गुलबर्गा शहर अध्यक्ष की जिम्मेदारी मिली थी। साल 1972 में वह पहली बार विधायक बने। इसके बाद वे 2008 तक लगातार विधायक चुने जाते रहे। साल 2009 में पार्टी ने उन्हें गुलबर्गा लोकसभा सीट से उम्मीदवार बनाया गया। इसके बाद वह लोकसभा पहुंचे। वह लगातार दो बार 2009 और 2014 में लोकसभा सांसद बने। खड़गे अपने राजनीतिक करियर में नौ बार विधायक रह चुके हैं।

राजनीतिक करियर में खड़गे का नाम 2 बड़े विवादों में आ चुका है। साल 2000 में कन्नड़ सुपरस्टार डॉ. राजकुमार का चंदन तस्कर वीरप्पन ने अपहरण कर लिया था। उस वक्त खड़गे प्रदेश के गृह मंत्री थे, जिसके बाद विपक्ष ने उनकी भूमिका पर सवाल उठाया।

वहीं इसी साल नेशनल हेराल्ड केस में इडी ने उनसे पूछताछ की थी। हेराल्ड केस में मनी लॉन्ड्रिंग का आरोप है। हालांकि अब तक उन पर कोई कार्रवाई नहीं हुई है।

खड़गे के परिवार में पत्नी राधाबाई के अलावा तीन बेटियां और दो बेटे हैं। उनका एक बेटा कर्नाटक के बेंगलुरु में स्पर्श हॉस्पिटल का मालिक है, जबकि दूसरा बेटा प्रियांक विधायक हैं। 2019 चुनाव के दौरान खड़गे ने अपनी संपत्ति करीब 10 करोड़ के आसपास बताई थी।

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