ठाकरे विरुद्ध शिंदे मामले को लेकर सुप्रीम कोर्ट में पिता – पुत्र आमने सामने

ठाकरे विरुद्ध शिंदे मामले को लेकर सुप्रीम कोर्ट में पिता – पुत्र आमने सामने

दिल्ली न्यायालयों में महाराष्ट्र सरकार का पक्ष रखने 130 वकीलों की फौज तैनात

योगेश पाण्डेय – संवाददाता 

मुंबई : महाराष्ट्र में सत्ता परिवर्तन के बाद शिवसेना के ठाकरे और शिंदे गुट के बीच कानूनी लड़ाई जारी है, इसलिए राज्य सरकार द्वारा सुप्रीम कोर्ट और दिल्ली की अन्य अदालतों में दायर मामलों में महाराष्ट्र सरकार का प्रतिनिधित्व करने के लिए 130 वकीलों की नियुक्ति की गई है। वकीलों की टीम में मुख्य न्यायाधीश उदय ललित के बेटे एड. श्रीयांश ललित समेत मुकुल रोहतगी, नीरज कौल, अरविंद दातार, श्याम दीवान, सत्यरंजन धर्माधिकारी, महेश जेठमलानी, राज्य के पूर्व महाधिवक्ता डायलस खंबाटा आदि का समावेश है।

राज्य सरकार के कानून और न्याय विभाग ने 13 सितंबर को एक अधिसूचना जारी करते हुए बताया की सुप्रीम कोर्ट के साथ-साथ दिल्ली उच्च न्यायालय समेत दिल्ली की अन्य अदालतों और न्यायाधिकरणों के समक्ष दीवानी और आपराधिक मामलों में महाराष्ट्र सरकार का प्रतिनिधित्व करने के लिए 130 अधिवक्ताओं की नियुक्ति की गई है। हालांकि, इन नियुक्तियों का शिवसेना में चल रहे विवाद और सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिकाओं से कोई लेना-देना नहीं है, कानून और न्याय विभाग के वरिष्ठ अधिकारी ने कहा।

उद्धव ठाकरे या एकनाथ शिंदे किसकी शिवसेना हैं ? इस सन्दर्भ में अदालती लड़ाई चल रही है। एकनाथ शिंदे मुख्यमंत्री हैं। उनकी सरकार द्वारा नियुक्त अधिवक्ताओं की सूची में सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश उदय ललित के पुत्र श्रीयांश ललित शामिल हैं। वहीं मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट में हुई सुनवाई के दौरान नीरज कौल ने शिंदे समूह का पक्ष रखा। उनका भी नाम इस सूची में शामिल हैं। अरविंद दातार केंद्रीय चुनाव आयोग के वकील हैं। सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के मुताबिक चुनाव आयोग तय करेगा कि असली शिवसेना उद्धव ठाकरे या एकनाथ शिंदे में किसे मिलेगी और किसे पार्टी का चुनाव चिह्न मिलेगा।

दातार राज्य सरकार की अधिवक्ता सूची में है। ये नियुक्तियां तीन साल के लिए की गई हैं। विधि एवं न्याय विभाग के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि राज्य में सत्ता हस्तांतरण को लेकर सुप्रीम कोर्ट में चल रही कानूनी और संवैधानिक लड़ाई में राज्य सरकार पक्षकार नहीं है। ऐसी नियुक्तियां हर तीन साल में की जाती हैं। राज्य सरकार की सूची में शामिल अधिवक्ताओं को किस मामले में भाग लेना है और किस मामले में नहीं लेना है, इसकी पूरी आजादी होती है।

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